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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 3 • Mantra 50

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 3 • मन्त्र 50

12.3.50

Mantra ID: 12.3.50

सम॒ग्नयः॑ विदुर॒न्यो अ॒न्यं य ओष॑धीः॒ सच॑ते॒ यश्च॒ सिन्धू॑न् । याव॑न्तो दे॒वा दि॒व्या॒तप॑न्ति॒ हिर॑ण्यं॒ ज्योतिः॒ पच॑तो बभूव ॥ (५०)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.3.50 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ओषधियों का भक्षण करने वाले अग्नि तथा जलों के सेवन कर्ता अग्नि एकदूसरे को जानते हैं. उन के अतिरिक्त अन्य अग्नि भी इस कर्म को जानते हैं. देवताओं के तप, सुवर्ण तथा चमचमाते हुए अन्य पदार्थ पाक कर्म करने वाले को प्राप्त होते हैं. (५०)

EN English Translation

Agni, the one who consumes medicines, and Agni, the one who consumes water, know each other. Apart from them, other agnis also know this karma. The penance, gold and other glittering substances of the deities are obtained by the person who performs the rituals. (50)

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