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अथर्ववेद

Kanda 12 • Sukta 4 • Mantra 17

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 12 • सूक्त 4 • मन्त्र 17

12.4.17

Mantra ID: 12.4.17

य ए॑ना॒मव॑शा॒माह॑ दे॒वानां॒ निहि॑तं नि॒धिम् । उ॒भौ तस्मै॑ भवाश॒र्वौ प॑रि॒क्रम्येषु॑मस्यतः ॥ (१७)

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अथर्ववेद मन्त्र 12.4.17 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यह वशा इन देवताओं की धरोहर के रूप में है. इस वशा को जो मनुष्य अवशा कहता है वह भव और शर्व के बाणों का लक्ष्य बनता है. (१७)

EN English Translation

This vasha is in the form of heritage of these gods. The person who calls this vasha avsha becomes the target of bhava and sharva's arrows. (17)

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