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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 1 • Mantra 11

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 1 • मन्त्र 11

13.1.11

Mantra ID: 13.1.11

ऊ॒र्ध्वो रोहि॑तो॒ अधि॒ नाके॑ अस्था॒द्विश्वा॑ रू॒पाणि॑ ज॒नय॒न्युवा॑ क॒विः । ति॒ग्मेना॒ग्निर्ज्योति॑षा॒ वि भा॑ति तृ॒तीये॑ चक्रे॒ रज॑सि प्रि॒याणि॑ ॥ (११)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.1.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जब वे सूर्य ऊंचे हो कर स्वर्ग में प्रतिष्ठित होते हैं, तब वे सब रूपों को प्रकट करते हैं. उन सूर्य की ही तीक्ष्ण ज्योति से अग्नि ज्योति वाली है. वे तृतीय लोक अर्थात्‌ द्युलोक में इच्छित फलों को प्रकट करते हैं. (११)

EN English Translation

When those suns are elevated and established in heaven, they reveal all forms. Agni is light from the sharp light of those suns. They reveal the desired fruits in the third world i.e. Duloka. (11)

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