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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 1 • Mantra 52

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 1 • मन्त्र 52

13.1.52

Mantra ID: 13.1.52

वेदिं॒ भूमिं॑ कल्पयि॒त्वा दिवं॑ कृ॒त्वा दक्षि॑णाम् । घ्रं॒सं तद॒ग्निं कृ॒त्वा च॒कार॒ विश्व॑मात्म॒न्वद्व॒र्षेणाज्ये॑न॒ रोहि॑तः ॥ (५२)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.1.52 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

रोहित ने पृथ्वी को वेदी बना कर, आकाश को दक्षिणा का रूप दे कर और दिन को अग्नि स्वीकार कर के वर्षा रूपी घृत से जगत्‌ को आत्मा के समान बना लिया है. (५२)

EN English Translation

Rohita has made the world like a soul by making the earth an altar, giving the sky the form of dakshina and accepting the day as agni. (52)

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