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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 2 • Mantra 42

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 2 • मन्त्र 42

13.2.42

Mantra ID: 13.2.42

आ॒रोह॑न्छु॒क्रो बृ॑ह॒तीरत॑न्द्रो॒ द्वे रू॒पे कृ॑णुते॒ रोच॑मानः । चि॒त्रश्चि॑कि॒त्वान्म॑हि॒षो वात॑माया॒ याव॑तो लो॒कान॒भि यद्वि॒भाति॑ ॥ (४२)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.2.42 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ये रोहित सूर्य रथ पर और अश्चों पर अपने दो रूप बनाते हैं. ये पूज्य महतत्वशाली और प्रकाशमान हैं. सुंदर गमन वाले सूर्य सभी लोकों को प्रकाशित करते हैं. (४२)

EN English Translation

These Rohits create their two forms on the Surya Rath and on the Ashcha. They are revered and enlightened. The sun with beautiful movement illuminates all the worlds. (42)

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