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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 2 • Mantra 45

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 2 • मन्त्र 45

13.2.45

Mantra ID: 13.2.45

पर्य॑स्य महि॒मा पृ॑थि॒वीं स॑मु॒द्रं ज्योति॑षा वि॒भ्राज॒न्परि॒ द्याम॒न्तरि॑क्षम् । सर्वं॑ सं॒पश्य॑न्त्सुवि॒दत्रो॒ यज॑त्र इ॒दं शृ॑णोतु॒ यद॒हं ब्रवी॑मि ॥ (४५)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.2.45 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सूर्य अपनी ज्योति के द्वारा व्याप्त हो कर पृथ्वी, सागर और अंतरिक्ष में अपनी ज्योति के द्वारा व्याप्त हैं. सब के कर्मों को देखने वाले सूर्य की महिमा अंतरिक्ष में फैली हुई है. सूर्य शोभना विद्या वाले तथा पूज्य हैं. (४५)

EN English Translation

The sun is permeated by its light and is permeated by its light in the earth, ocean and space. The glory of the sun, which sees everyone's deeds, is spread in space. The Sun is a scholar and revered. (45)

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