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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 3 • Mantra 8

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 3 • मन्त्र 8

13.3.8

Mantra ID: 13.3.8

अ॑होरा॒त्रैर्विमि॑तं त्रिं॒शद॑ङ्गं त्रयोद॒शं मासं॒ यो नि॒र्मिमी॑ते । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (८)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.3.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिन्होंने तीन दिनरात्रि का समूह बना कर तेरहवें अधिक मास का निर्माण किया, ऐसे क्रोधयुक्त देव के अपराधी और विद्वान्‌ ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! कंपित करते हुए क्षीण बनाओ तथा उसे अपने पाशों में बांध लो. (८)

EN English Translation

Those who formed the thirteenth more month by forming a group of three days and nights, o Rohit Dev, the criminal of such an angry god and the violent of the learned Brahmin! Make it weak by staggering and tie it in your loops. (8)

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