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अथर्ववेद

Kanda 13 • Sukta 5 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 13 • सूक्त 5 • मन्त्र 2

13.5.2

Mantra ID: 13.5.2

न द्वि॒तीयो॒ न तृ॒तीय॑श्चतु॒र्थो नाप्यु॑च्यते । य ए॒तं दे॒वमे॑क॒वृतं॒ वेद॑ ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 13.5.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इन एकवृत अर्थात्‌ ब्रह्म का ज्ञाता द्वितीय, तृतीय चतुर्थ नहीं कहलाता. (२)

EN English Translation

These ekvrit i.e. the knower of Brahman is not called second, third fourth. (2)

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