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अथर्ववेद

Kanda 14 • Sukta 2 • Mantra 30

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 14 • सूक्त 2 • मन्त्र 30

14.2.30

Mantra ID: 14.2.30

रु॒क्मप्र॑स्तरणंव॒ह्यं विश्वा॑ रू॒पाणि॒ बिभ्र॑तम् । आरो॑हत्सू॒र्या सा॑वि॒त्री बृ॑ह॒तेसौभ॑गाय॒ कम् ॥ (३०)

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अथर्ववेद मन्त्र 14.2.30 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सूर्या सुख देने के लिए इस पलंग पर चढ़ी थी जिस पर मन को अच्छा लगने वाला बिछौना बिछा था. (३०)

EN English Translation

Surya had climbed this bed to give happiness, on which the bed that the mind liked was laid. (30)

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