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अथर्ववेद

Kanda 15 • Sukta 2 • Mantra 17

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 15 • सूक्त 2 • मन्त्र 17

15.2.17

Mantra ID: 15.2.17

वै॑रू॒पाय॑ च॒ वैस वै॑रा॒जाय॑ चा॒द्भ्यश्च॒ वरु॑णाय च॒ राज्ञ॒ आ वृ॑श्चते॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॒व्रात्य॑मुप॒वद॑ति ॥ (१७)

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अथर्ववेद मन्त्र 15.2.17 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो इस प्रकार जानने वाले और व्रतधारी का अपमान करता है, वह वैरूप, वैराज, जल और राजा वरुण का अपराधी होता है. (१७)

EN English Translation

The one who insults the one who knows and fasts in this way is the culprit of Vairup, Vairaj, Jal and King Varuna. (17)

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