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अथर्ववेद

Kanda 15 • Sukta 4 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 15 • सूक्त 4 • मन्त्र 2

15.4.2

Mantra ID: 15.4.2

वा॑स॒न्तौ मासौ॑गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन्बृ॒हच्च॑ रथन्त॒रं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑ ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 15.4.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

देवताओं ने उस के लिए वसंत ऋतु के दो महीनों को पूर्व दिशा में रक्षक नियुक्त किया. बृहत्साम और रथंतर को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (२)

EN English Translation

The gods appointed him a protector in the east direction for two months of spring. Brihatsam and Rathantar were made to perform the rituals. (2)

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