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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 1 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 1 • मन्त्र 1

18.1.1

Mantra ID: 18.1.1

ओ चि॒त्सखा॑यंस॒ख्या व॑वृत्यां ति॒रः पु॒रु चि॑दर्ण॒वं ज॑ग॒न्वान् । पि॒तुर्नपा॑त॒मा द॑धीतवे॒धा अधि॒ क्षमि॑ प्रत॒रं दीध्या॑नः ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.1.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यमी का कथन-मैं समान प्रसिद्धि वाले मित्र यम को आदर भाव के अनुकूल बनाती हूं. समुद्र तट के समीप वाले द्वीप में चलते हुए यम अपने पुत्र को मुझ में स्थापित करें. हे यम! तुम्हारी प्रसिद्धि सभी लोकों में है. तुम सदा तेज से दीप्त रहो. (१)

EN English Translation

Yami's statement - I make Yama, a friend of equal fame, suited to respect. Yama should establish his son in me while walking in the island near the beach. O Yama! Your fame is in all worlds. May you always be bright. (1)

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