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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 1 • Mantra 19

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 1 • मन्त्र 19

18.1.19

Mantra ID: 18.1.19

रप॑द्गन्ध॒र्वीरप्या॑ च॒ योष॑णा न॒दस्य॑ ना॒दे परि॑ पातु नो॒ मनः॑ । इ॒ष्टस्य॒मध्ये॒ अदि॑ति॒र्नि धा॑तु नो॒ भ्राता॑ नो ज्ये॒ष्ठः प्र॑थ॒मो वि वो॑चति ॥ (१९)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.1.19 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जल धारण करने वाले सूर्य की वाणी और अंतरिक्ष में विचरने वाली सरस्वती मेरे द्वारा अग्नि की स्तुति कराएं तथा मेरे स्तुति रूप नाद में मन की रक्षा करे. इस के बाद देवमाता अदिति मुझे फल के मध्य स्थापित करें. बंधु के समान हितकारी अग्नि मुझे उत्तम यजमान बनाएं. (१९)

EN English Translation

May the voice of the sun, who holds water, and Saraswati, who roams in space, praise the agni through me and protect the mind in my praise form. After this, Devmata Aditi install me in the middle of the fruit. Make me a good host like a brother. (19)

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