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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 1 • Mantra 29

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 1 • मन्त्र 29

18.1.29

Mantra ID: 18.1.29

द्यावा॑ ह॒क्षामा॑ प्रथ॒मे ऋ॒तेना॑भिश्रा॒वे भ॑वतः सत्य॒वाचा॑ । दे॒वो यन्मर्ता॑न्य॒जथा॑यकृ॒ण्वन्त्सीद॒द्धोता॑ प्र॒त्यङ् स्वमसुं॒ यन् ॥ (२९)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.1.29 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

आकाश और पृथ्वी मुख तथा सत्य वाणी हैं. जब अग्नि देव यजमान के समीप आ कर यज्ञ संपन्न करने के लिए बैठे, तब ये आकाश और पृथ्वी स्तुति सुनने के योग्य हैं. (२९)

EN English Translation

The sky and the earth are the mouths and the voice of truth. When agni dev comes near the host and sits to complete the yajna, then these heavens and earth are worthy of hearing praise. (29)

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