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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 1 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 1 • मन्त्र 4

18.1.4

Mantra ID: 18.1.4

न य॑त्पु॒राच॑कृ॒मा कद्ध॑ नू॒नमृ॒तं वद॑न्तो॒ अनृ॑तं॒ रपे॑म । ग॑न्ध॒र्वो अ॒प्स्वप्या॑ च॒योषा॒ सा नौ॒ नाभिः॑ पर॒मं जा॒मि तन्नौ॑ ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.1.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यम-हे यमी! असत्य बात को हम सत्य भाषण करने वाले किस प्रकार सत्य कहें? जल को धारण करने वाले सूर्य भी आकाश में अपनी पत्नी के सहित स्थित हैं. इसलिए एक ही माता और पिता वाले हम दोनों उन्हीं के सामने तेरी इच्छा पूर्ण करने में समर्थ न होंगे. (४)

EN English Translation

Yama- O Yummy! How do we truth-makers call the untruth the truth? The sun, which holds water, is also located in the sky with his wife. Therefore, both of us with the same mother and father will not be able to fulfill your wish in front of them. (4)

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