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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 1 • Mantra 43

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 1 • मन्त्र 43

18.1.43

Mantra ID: 18.1.43

सर॑स्वति॒ यास॒रथं॑ य॒याथो॒क्थैः स्व॒धाभि॑र्देवि पि॒तृभि॒र्मद॑न्ती । स॑हस्रा॒र्घमि॒डोअत्र॑ भा॒गं रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानाय धेहि ॥ (४३)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.1.43 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सरस्वती! तुम अपनेआप को तृप्त करती हुई पितरों सहित एक ही रथ पर आती हो. अनेक व्यक्तियों तथा प्रजाओं को तृप्त कर के अन्न के भाग को और अन्न के बल को मुझ यजमान को प्रदान करो. (४३)

EN English Translation

O Saraswati! You come on the same chariot with your fathers, satisfying yourself. Satisfy many people and people and give part of the food and the strength of the food to my host. (43)

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