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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 1 • Mantra 48

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 1 • मन्त्र 48

18.1.48

Mantra ID: 18.1.48

स्वा॒दुष्किला॒यंमधु॑माँ उ॒तायं ती॒व्रः किला॒यं रस॑वाँ उ॒तायम् । उ॒तो न्वस्यप॑पि॒वांस॒मिन्द्रं॒ न कश्च॒न स॑हत आह॒वेषु॑ ॥ (४८)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.1.48 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यह सोमरस निश्चित रूप से स्वादिष्ट है, यह सोमरस माधुर्य गुण से युक्त है. यह सोमरस पीने में निश्चित रूप से तीखा लगता है. यह सोम उत्तम स्वाद वाला है. इस को पीने के इच्छुक इंद्र को संग्राम में कोई भी सहन नहीं कर पाता. तात्पर्य यह है कि संग्राम में इंद्र के सामने कोई भी नहीं टिक पाता है. (४८)

EN English Translation

This sommeras is definitely delicious, this sommeras has melody properties. It definitely feels tart to drink sommeras. This som tastes great. No one can tolerate Indra in the struggle, who wants to drink it. This means that no one can stand in front of Indra in the struggle. (48)

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