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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 1 • Mantra 55

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 1 • मन्त्र 55

18.1.55

Mantra ID: 18.1.55

अपे॑त॒ वीत॒ विच॑ सर्प॒तातो॒ऽस्मा ए॒तं पि॒तरो॑ लो॒कम॑क्रन् । अहो॑भिर॒द्भिर॒क्तुभि॒र्व्यक्तं य॒मो द॑दात्यव॒सान॑मस्मै ॥ (५५)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.1.55 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे राक्षसो! तुम इस स्थान से भागो. तुम चाहे यहां पर पहले से रहते हो अथवा नए आकर रहने लगे हो, तुम यहां से चले जाओ, क्योंकि यह स्थान इस प्रेत के लिए दिन, रात और जल के सहित रहने के लिए यम ने प्रदान कियाहै. (५५)

EN English Translation

O demons! You run from this place. Whether you already live here or have started living new, you should leave here, because this place has been provided by Yama for this ghost to live with day, night and water. (55)

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