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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 2 • Mantra 32

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 2 • मन्त्र 32

18.2.32

Mantra ID: 18.2.32

य॒मः परोऽव॑रो॒विव॑स्वा॒न्ततः॒ परं॒ नाति॑ पश्यामि॒ किं च॒न । य॒मे अ॑ध्व॒रो अधि॑ मे॒निवि॑ष्टो॒ भुवो॒ विव॑स्वान॒न्वात॑तान ॥ (३२)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.2.32 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सूर्य के पुत्र यम अपने पिता से भी अधिक तेजस्वी हैं. मैं किसी भी प्राणी को यम से श्रेष्ठ नहीं पाता हूं. तेरा यज्ञ उन श्रेष्ठ यम में व्याप्त हो रहा है. यज्ञ की सिद्धि के लिए ही सूर्य ने भूखंडों को विस्तृत किया है. (३२)

EN English Translation

Surya's son Yama is more stunning than his father. I do not find any creature superior to Yama. Your yajna is pervading those superior Yamas. The Sun has expanded the plots only for the accomplishment of the yajna. (32)

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