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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 2 • Mantra 50

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 2 • मन्त्र 50

18.2.50

Mantra ID: 18.2.50

इ॒दमिद्वा उ॒नाप॑रं दि॒वि प॑श्यसि॒ सूर्य॑म् । मा॒ता पु॒त्रं यथा॑ सि॒चाभ्येनं भूम ऊर्णुहि ॥ (५०)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.2.50 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मृतक! हम श्राद्ध आदि में जो कुछ देते हैं, वही तेरा जीवन है. तेरे जीवन का अन्य कोई साधन नहीं है. इस श्मशान को प्राप्त हुआ तू सूर्य के दर्शन करता है. हे पृथ्वी! जिस प्रकार माता अपने पुत्र को आंचल से ढकती है. उसी प्रकार तुम इस मृतक को अपने तेज से ढक लो. (५०)

EN English Translation

O dead! Whatever we give in Shradh etc. is your life. There is no other means of your life. You have received this crematorium, you see the sun. O earth! Just as the mother covers her son with anchal. In the same way, cover this dead with your glory. (50)

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