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18.2.8
अ॒जोभा॒गस्तप॑स॒स्तं त॑पस्व॒ तं ते॑ शो॒चिस्त॑पतु॒ तं ते॑ अ॒र्चिः । यास्ते॑शि॒वास्त॒न्वो जातवेद॒स्ताभि॑र्वहैनं सु॒कृता॑मु लो॒कम् ॥ (८)
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अथर्ववेद मन्त्र 18.2.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे अग्नि! इस प्रेत का जो जन्म न लेने वाला भाग अर्थात् आत्मा है, उसे तुम अपने तप से संतप्त करो. तेरी दीप्त होती हुई ज्वाला इस प्रेत की आत्मा को तपाए. हे जातवेद अग्नि! तेरा जो ज्वालारूपी कल्याणकारी शरीर है, उस के द्वारा इस प्रेत की आत्मा को उत्तम कर्म करने वालों के लोक में ले जा. (८)
EN English Translation
O agni! The unborn part of this ghost, that is, the soul, should be afflicted with your tenacity. May your glowing flame heat the soul of this ghost. O jataved agni! Take the soul of this ghost to the world of those who do good deeds through your flame-like welfare body. (8)