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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 3 • Mantra 27

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 3 • मन्त्र 27

18.3.27

Mantra ID: 18.3.27

अदि॑तिर्मादि॒त्यैः प्र॒तीच्या॑ दि॒शः पा॑तु बाहु॒च्युता॑ पृथि॒वीद्यामि॑वो॒परि॑ । लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ ये दे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥ (२७)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.3.27 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

देव माता अदिति पश्चिम दिशा के भय से मेरी रक्षा करें. दाता के द्वारा दी गई पृथ्वी जिस प्रकार दाता और दान ग्रहण करने वाले के स्वर्ग संबंधी उपभोग की रक्षा करती है, उसी प्रकार मेरी रक्षा करने वाली बने. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों को हम हवि के द्वारा पूजते हैं. हे देवगण! इस यज्ञ में तुम भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२७)

EN English Translation

May Dev Mata Aditi protect me from the fear of west direction. Just as the earth given by the giver protects the heavenly consumption of the giver and the recipient of the donation, so be the protector of me. As the fruit of virtue, we worship those who initiate the way to heaven through Havi. O Gods! Become the one who gets a part in this yajna. (27)

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