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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 4 • Mantra 11

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 4 • मन्त्र 11

18.4.11

Mantra ID: 18.4.11

शम॑ग्नेप॒श्चात्त॑प॒ शं पु॒रस्ता॒च्छमु॑त्त॒राच्छम॑ध॒रात्त॑पैनम् । एक॑स्त्रे॒धाविहि॑तो जातवेदः स॒म्यगे॑नं धेहि सु॒कृता॑मु लो॒के ॥ (११)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.4.11 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! तुम पश्चिम, पूर्व, उत्तर, दक्षिण आदि दिशाओं से इस मृतक को सुखपूर्व भस्म करो. तुम एक हो, पर यजमान ने तुम्हें तीन रूपों में स्थापित किया था. तुम इस यजमान को श्रेष्ठ जनों के लोक में भलीभांति स्थापित करो. (११)

EN English Translation

O agni! You should consume this dead person happily from the directions of west, east, north, south etc. You are one, but the host established you in three forms. You establish this host well in the world of the superiors. (11)

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