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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 4 • Mantra 24

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 4 • मन्त्र 24

18.4.24

Mantra ID: 18.4.24

अ॑पू॒पवा॒नप॑वांश्च॒रुरेह सी॑दतु । लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ ये दे॒वानां॑हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥ (२४)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.4.24 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस गेहूं तथा अन्य प्रकार के पूओं से युक्त कुंभी पक्व ओदन रूप चरु इस कार्य में अस्थियों के पश्चिम भाग में रहे. यह संस्कार जिस प्रेत के लिए किया जा रहा है, उस के लिए स्वर्ग का निर्माण करने वाले इंद्र आदि देवताओं में से हवि के अधिकारी यहां वर्तमान देवताओं को हम प्रसन्न करते हैं. (२४)

EN English Translation

The comb with wheat and other types of poos remained in the western part of the bones in this work. We please the present deities here, including Indra, who created heaven for the ghost for which this rite is being performed. (24)

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