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अथर्ववेद

Kanda 18 • Sukta 4 • Mantra 40

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 18 • सूक्त 4 • मन्त्र 40

18.4.40

Mantra ID: 18.4.40

आपो॑ अ॒ग्निं प्रहि॑णुत पि॒तॄँरुपे॒मं य॒ज्ञं पि॒तरो॑ मे जुषन्ताम् । आसी॑ना॒मूर्ज॒मुप॒ येसच॑न्ते॒ ते नो॑ र॒यिं सर्व॑वीरं॒ नि य॑च्छान् ॥ (४०)

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अथर्ववेद मन्त्र 18.4.40 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे जल! अग्नि को पितरों के पास भेजो. मेरे पितृगण इस यज्ञ का सेवन करते हैं. जो पितर हमारे द्वारा प्रस्तुत किए गए अन्न का सेवन करते हैं, वे हमें निरंतर वीरत्व तथा धन संपत्ति देते रहें. (४०)

EN English Translation

O water! Send the agni to the ancestors. My ancestors consume this yajna. The ancestors who consume the food presented by us, they should continue to give us heroism and wealth. (40)

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