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19.53.3
पू॒र्णः कु॒म्भोऽधि॑ का॒ल आहि॑त॒स्तं वै पश्या॑मो बहु॒धा नु सन्तः॑ । स इ॒मा विश्वा॒ भुव॑नानि प्र॒त्यङ्का॒लं तमा॒हुः प॑र॒मे व्योमन् ॥ (३)
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अथर्ववेद मन्त्र 19.53.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
यह ब्रह्मांड रूप भरा हुआ कुंभ अर्थात् घड़ा संवत्सर रूपी काल पर रखा हुआ है. संत अर्थात् ज्ञानी पुरुष उस काल के दिवस, रात्रि आदि अनेक रूपों को देखते हैं. यह काल रूप परमात्मा सभी उपस्थित प्राणियों के सामने प्रकट होता है तथा उन्हें अपने में मिला लेता है. इस काल को आकाश के समान निर्लेप कहा जाता है. (३)
EN English Translation
This universe is kept in the form of Kumbh i.e. pitcher Samvatsar. Saints, that is, wise men, see many forms of day, night, etc. of that period. This time form God appears in front of all the present beings and merges them into himself. This period is called nirlep like the sky. (3)