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अथर्ववेद

Kanda 2 • Sukta 27 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 2 • सूक्त 27 • मन्त्र 1

2.27.1

Mantra ID: 2.27.1

नेच्छत्रुः॒ प्राशं॑ जयाति॒ सह॑मानाभि॒भूर॑सि । प्राशं॒ प्रति॑प्राशो जह्यर॒सान्कृ॑ण्वोषधे ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 2.27.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे ग्वारपाठा नामक जड़ी! तुम्हारा सेवन करने वाले वक्ता को उस का विरोधी न जीत सके. तुम्हारा स्वभाव शत्रु को सहन करने का है, इसीलिए तुम प्रतिवादी को पराजित कर देती हो. मुझ प्रश्न पूछने वाले से जो विरोधी प्रतिप्रश्न पूछते हैं, उन को तुम पराजित करो. हे ओषधि! मेरे विरोधी वक्ताओं का गला सुखा दो, जिस से वे बोल न सकें. (१)

EN English Translation

O herb called guarpatha! The speaker who consumes you cannot win his opponent. Your nature is to tolerate the enemy, that is why you defeat the defendant. Defeat the opponents who ask me questions. O medicine! Dry the throats of my opposing speakers so that they cannot speak. (1)

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