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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 113 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 113 • मन्त्र 2

20.113.2

Mantra ID: 20.113.2

तं हि स्व॒राजं॑ वृष॒भं तमोज॑से धि॒षणे॑ निष्टत॒क्षतुः॑ । उ॒तोप॒मानां॑ प्रथ॒मो नि षी॑दसि॒ सोम॑कामं॒ हि ते॒ मनः॑ ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.113.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

वे इंद्र कामनाओं की वर्षा करने वाले तथा अपने तेज से तेजस्वी हैं. वे आकाश और पृथ्वी को लघु बनाते हैं. हे इंद्र! तुम उपमानों में सर्वश्रेष्ठ होने के साथ ही सोमरस की कामना करते हो. (२)

EN English Translation

He is the one who showers indra's desires and is radiant with his brilliance. They make the sky and earth miniature. O Indra! You wish somras as well as the best of the above. (2)

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