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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 133 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 133 • मन्त्र 5

20.133.5

Mantra ID: 20.133.5

श्लक्ष्णा॑यां॒ श्लक्ष्णि॑कायां॒ श्लक्ष्ण॑मे॒वाव॑ गूहसि । न वै॑ कुमारि॒ तत्तथा॒ यथा॑ कुमारि॒ मन्य॑से ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.133.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे कुमारी! तु आलिंगन में अपना शरीर छिपाती है. तू उसे जैसा समझती है वह उस तरह का नहीं है. (५)

EN English Translation

O virgin! You hide your body in the embrace. He's not the kind you think he thinks. (5)

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