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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 143 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 143 • मन्त्र 3

20.143.3

Mantra ID: 20.143.3

को वा॑म॒द्या क॑रते रा॒तह॑व्य ऊ॒तये॑ वा सुत॒पेया॑य वा॒र्कैः । ऋ॒तस्य॑ वा व॒नुषे॑ पू॒र्व्याय॒ नमो॑ येमा॒नो अ॑श्वि॒ना व॑वर्तत् ॥ (३)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.143.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

कौन सा हवि दाता रक्षा पाने के लिए तथा तैयार किया हुआ सोमरस पीने के लिए तुम्हें बुला रहा है. कौन तुम्हारी सेवा कर रहा है. यज्ञ की सेवा करने वाले इंद्र को नमस्कार है. अश्विनीकुमारों को यहां लाने वाले रथ को मैं नमस्कार करता हूं. (३)

EN English Translation

Which Havi giver is calling you to get protection and drink ready-made somers? Who is serving you? Salutations to Indra, who served the yajna. I salute the chariot that brought Ashwinikumars here. (3)

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