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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 25 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 25 • मन्त्र 2

20.25.2

Mantra ID: 20.25.2

आपो॒ न दे॒वीरुप॑ यन्ति हो॒त्रिय॑म॒व प॑श्यन्ति॒ वित॑तं॒ यथा॒ रजः॑ । प्रा॒चैर्दे॒वासः॒ प्र ण॑यन्ति देव॒युं ब्र॑ह्म॒प्रियं॑ जोषयन्ते व॒रा इ॑व ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.25.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! जिस प्रकार जल नीचे की ओर बहता हुआ सागर में जाता है, उसी प्रकार स्तुतियां तुम से जा कर मिल जाती हैं. जिस प्रकार मनुष्य सूर्य के प्रकाश की चकाचौंध के कारण नीचे की ओर देखने लगते हैं, उसी प्रकार लोग तुम्हारे तेज से दृष्टियां बचाते हैं. जिस प्रकार स्तोता तुम्हें यज्ञ वेदी के सामने बुला लेते हैं, उसी प्रकार ऋत्विज्‌ तुम्हारी सेवा करते हैं. (२)

EN English Translation

O Indra! Just as water flows down into the ocean, so praise comes from you. Just as humans start looking downwards due to the glare of sunlight, so people save their visions from your brightness. Just as the stots call you in front of the yagna altar, so the Ritwijas serve you. (2)

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