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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 27 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 27 • मन्त्र 5

20.27.5

Mantra ID: 20.27.5

य॒ज्ञ इन्द्र॑मवर्धय॒द्यद्भूमिं॒ व्य॑वर्तयत् । च॑क्रा॒ण ओ॑प॒शं दि॒वि ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.27.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो इंद्र आकाश में मेघ को विस्तृत करते हैं तथा वर्षा के जल से धरती को गीला करते हैं, वे ही वर्षा के जल से भूमि के धान्यों को पुष्ट बनाते हैं. (५)

EN English Translation

Indra, who expands the cloud in the sky and wets the earth with rainwater, only makes the grains of the land strong with rainwater. (5)

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