Popular:
अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 30 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 30 • मन्त्र 2

20.30.2

Mantra ID: 20.30.2

हरिं॒ हि योनि॑म॒भि ये स॒मस्व॑रन्हि॒न्वन्तो॒ हरी॑ दि॒व्यं यथा॒ सदः॑ । आ यं पृ॒णन्ति॒ हरि॑भि॒र्न धे॒नव॒ इन्द्रा॑य शू॒षं हरि॑वन्तमर्चत ॥ (२)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 20.30.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

प्राचीन महर्षियों ने इंद्र को अपने यज्ञ में शीघ्रता से बुलाने के लिए उन के अश्वों को प्रेरित किया. उन का स्तोत्र मूल रूप से इंद्र के ही निमित्त था. नव प्रसूता गाय जैसे दूध दे कर अपने स्वामी को तृप्त करती है, उसी प्रकार यजमान सोमरस के द्वारा इंद्र को तृप्त करते हैं. हे ऋत्विजो! शत्रु विनाशक, शक्तिशाली तथा हरि नामक अश्चों वाले इंद्र का पूजन करो. (२)

EN English Translation

The ancient Maharishis inspired Indra's horses to call him quickly in his yajna. His stotra was originally for Indra. Just as a newly married cow satisfies its master by giving milk, in the same way, the host satisfies Indra through Someras. O Ritvijo! Worship Indra, the destroyer of the enemy, the powerful and the horse named Hari. (2)

卐 HinduText AI