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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 34 • Mantra 12

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 34 • मन्त्र 12

20.34.12

Mantra ID: 20.34.12

यः श॑म्ब॑रं प॒र्यत॑र॒त्कसी॑भि॒र्योऽचा॑रुका॒स्नापि॑बत्सु॒तस्य॑ । अ॒न्तर्गि॒रौ यज॑मानं ब॒हुं जनं॒ यस्मि॒न्नामू॑र्छ॒त्स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (१२)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.34.12 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिन की हिंसा करने के लिए असुरों ने सोमपान करने वाले अध्वर्युजनों को घेर लिया था, जिन्होंने अपने वज्र से शंबर का दमन किया तथा जो संस्कार किए हुए सोमरस को पी चुके हैं, वे इंद्र हैं. (१२)

EN English Translation

To do the violence of whom the Asuras surrounded the sompanads, who suppressed shambar with their thunderbolt and those who have drunk the sanskar somaras are Indra. (12)

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