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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 34 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 34 • मन्त्र 3

20.34.3

Mantra ID: 20.34.3

यो ह॒त्वाहि॒मरि॑णात्स॒प्त सिन्धू॒न्यो गा उ॒दाज॑दप॒धा व॒लस्य॑ । यो अश्म॑नोर॒न्तर॒ग्निं ज॑जान सं॒वृक्स॒मत्सु॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (३)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.34.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिन्होंने आकाश में विचरण करने वाले मेघ का भेदन कर के नदियों को प्रवाहित किया तथा बल असुर द्वारा चुराई गई गायों को प्रकट किया, जिन्होंने मेघों में भरे हुए पाषाणों से विद्युत को उत्पन्न किया तथा जो युद्धं में शत्रुओं का विनाश करते हैं, वे ही इंद्र हैं. (३)

EN English Translation

Those who pierced the clouds moving in the sky and flowed the rivers and revealed the cows stolen by the force asura, who generated electricity from the stones filled in the clouds and who destroy the enemies in the war, they are Indra. (3)

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