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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 35 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 35 • मन्त्र 5

20.35.5

Mantra ID: 20.35.5

अ॒स्मा इदु॒ सप्ति॑मिव श्रव॒स्येन्द्रा॑या॒र्कं जु॒ह्वा॒ सम॑ञ्जे । वी॒रं दा॒नौक॑सं व॒न्दध्यै॑ पु॒रां गू॒र्तश्र॑वसं द॒र्माण॑म् ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.35.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं अन्न प्राप्ति की इच्छा से इंद्र के लिए हवि रूप अन्न प्रस्तुत करता हूं जो घी से मिला हुआ है. जिस प्रकार रथ में घोड़े जोड़े जाते हैं, उसी प्रकार मैं हवि को घृत युक्त करता हूं. इंद्र शत्रुओं को पराजित करने वाले, दान करने वाले और असुरों के नगरों को ध्वस्त करने वाले हैं. (५)

EN English Translation

I present havi roop food for Indra with the desire to get food which is mixed with ghee. Just as horses are added to the chariot, I give havi with ghee. Indra is the destroyer of enemies, the donor and the destroyer of the cities of asuras. (5)

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