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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 36 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 36 • मन्त्र 1

20.36.1

Mantra ID: 20.36.1

य एक॒ इद्धव्य॑श्चर्षणी॒नामिन्द्रं॒ तं गी॒र्भिर॒भ्यर्च आ॒भिः । यः पत्य॑ते वृष॒भो वृष्ण्या॑वान्त्स॒त्यः सत्वा॑ पुरुमा॒यः सह॑स्वान् ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.36.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो इंद्र यजमानों के यज्ञों में प्रधान रूप से आह्वान करने योग्य हैं, उन की मैं उन वाणियों के द्वारा स्तुति करता हूं, जिनके स्वामी इंद्र हैं. वे कामनाओं को पूर्ण करने वाले इंद्र की स्तुतियों के द्वारा प्रार्थना की जाती है. वे इंद्र बल के विनाशक, अनेक कर्म करने वाले तथा शक्तिशाली हैं. (१)

EN English Translation

I praise indra who is worthy of invoking the main in the yajnas of the hosts through the vaanis whose swami is Indra. They are prayed by praises of Indra, who fulfills the wishes. He is the destroyer of Indra's force, the doer of many deeds and is powerful. (1)

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