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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 66 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 66 • मन्त्र 1

20.66.1

Mantra ID: 20.66.1

स्तु॒हीन्द्रं॑ व्यश्व॒वदनू॑र्मिं वा॒जिनं॒ यम॑म् । अ॒र्यो गयं॒ मंह॑मानं॒ वि दा॒शुषे॑ ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.66.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे ऋत्विजो! जो इंद्र अपने रथ से घोड़ों को खोल कर शांत भाव से यज्ञ में बैठते हैं उन्हीं प्रशंसा के योग्य इंद्र की स्तुति यजमान की कल्याण कामना के लिए करो. (१)

EN English Translation

O Ritvijo! The Indra who opens the horses from his chariot and sits in the yagna calmly, praise Indra worthy of praise for the welfare of the host. (1)

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