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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 66 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 66 • मन्त्र 2

20.66.2

Mantra ID: 20.66.2

ए॒वा नू॒नमुप॑ स्तुहि॒ वैय॑श्व दश॒मं नव॑म् । सुवि॑द्वांसं च॒र्कृत्यं॑ च॒रणी॑नाम् ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.66.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो इंद्र सदा नवीन, महान और मेधावी हैं, हे यजमान! तुम उन्हीं इंद्र की पूजा करो. (२)

EN English Translation

Indra, who is always new, great and meritorious, O host! You worship the same Indra. (2)

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