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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 85 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 85 • मन्त्र 4

20.85.4

Mantra ID: 20.85.4

वि त॑र्तूर्यन्ते मघवन्विप॒श्चितो॒ऽर्यो विपो॒ जना॑नाम् । उप॑ क्रमस्व पुरु॒रूप॒मा भ॑र॒ वाजं॒ नेदि॑ष्ठमू॒तये॑ ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.85.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! तुम यहां शीघ्र आ कर विशाल रूप धारण करो. इन विद्वान्‌ मनुष्यों और यजमानों की उंगलियां शीघ्रताकारी हैं. तुम हमारे पालन के लिए अन्न हमारे समीप लाओ तथा हमें प्रदान करो. (४)

EN English Translation

O Indra! You come here soon and take a huge form. The fingers of these learned human beings and hosts are quick. Bring food near to us for our upbringing and give it to us. (4)

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