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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 94 • Mantra 8

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 94 • मन्त्र 8

20.94.8

Mantra ID: 20.94.8

गि॒रीँरज्रा॒न्रेज॑मानाँ अधारय॒द्द्यौः क्र॑न्दद॒न्तरि॑क्षाणि कोपयत् । स॑मीची॒ने धि॒षणे॒ वि ष्क॑भायति॒ वृष्णः॑ पी॒त्वा मद॑ उ॒क्थानि॑ शंसति ॥ (८)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.94.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सोमरस से हर्षित हुए इंद्र पर्वतों को धारण करते हैं, अंतरिक्ष के पदार्थो को कुपित करते हैं तथा झुलोक को कुंदनमय बनाते हैं. (८)

EN English Translation

Pleased with Someras, Indra holds the mountains, enrages the substances of space and makes the jhuloka kundanmaya. (8)

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