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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 96 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 96 • मन्त्र 4

20.96.4

Mantra ID: 20.96.4

अनु॑स्पष्टो भवत्ये॒षो अ॑स्य॒ यो अ॑स्मै रे॒वान्न सु॒नोति॒ सोम॑म् । निर॑र॒त्नौ म॒घवा॒ तं द॑धाति ब्रह्म॒द्विषो॑ ह॒न्त्यना॑नुदिष्टः ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.96.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो पुरुष सोम का संस्कार नहीं करता, वह इंदर के प्रहार के योग्य होता है. उस ब्रह्मद्वेषी और हवि का दान न करने वाले को इंद्र नष्ट कर देते हैं. (४)

EN English Translation

A man who does not perform the rites of Soma is worthy of inder's attack. Indra destroys that brahmantrist and those who do not donate Havi. (4)

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