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अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 10 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 10 • मन्त्र 2

3.10.2

Mantra ID: 3.10.2

यां दे॒वाः प्र॑ति॒नन्द॑न्ति॒ रात्रिं॑ धे॒नुमु॑पाय॒तीम् । सं॑वत्स॒रस्य॒ या पत्नी॒ सा नो॑ अस्तु सुमङ्ग॒ली ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 3.10.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस एकाष्टका संबंधी रात्रि को धेनु के रूप में समीप आती हुई देख कर हवि का भोग देने वाले देवगण, उस की प्रशंसा करते हैं. वह एकाष्टका रात्रि संवत्सर की पत्नी है. वह हमारे लिए कल्याण करने वाली हो. (२)

EN English Translation

The devas, who offered havi on the night of ekashtaka, who saw the night approaching in the form of Dhenu, praise him. She is the wife of Ekashtaka Ratri Samvatsar. She is a welfare doer for us. (2)

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