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अथर्ववेद

Kanda 3 • Sukta 17 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 3 • सूक्त 17 • मन्त्र 2

3.17.2

Mantra ID: 3.17.2

यु॒नक्त॒ सीरा॒ वि यु॒गा त॑नोत कृ॒ते योनौ॑ वपते॒ह बीज॑म् । वि॒राजः॒ श्नुष्टिः॒ सभ॑रा असन्नो॒ नेदी॑य॒ इत्सृ॒ण्यः॑ प॒क्वमा य॑वन् ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 3.17.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे किसानो! हलों को जुओं से युक्त करो और जुओं को बैलों के कंधों पर स्थापित करो. अंकुर उगने योग्य इस जुते हुए खेत में गेहूं, जौ आदि बीजों को बोओ. हमारे अन्न के पौधे दानों के भार वाले हों. शीघ्र ही वे पौधे पक कर दरांती का स्पर्श पाने योग्य हो जाएं. (२)

EN English Translation

O farmers! Cover the ploughs with lice and place the lice on the shoulders of the bulls. Sow seeds like wheat, barley, etc. in this growing field. Our food plants should be loaded with grains. Soon those plants will ripen and become worthy of the touch of the tree. (2)

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