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अथर्ववेद

Kanda 4 • Sukta 13 • Mantra 7

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 4 • सूक्त 13 • मन्त्र 7

4.13.7

Mantra ID: 4.13.7

हस्ता॑भ्यां॒ दश॑शाखाभ्यां जि॒ह्वा वा॒चः पु॑रोग॒वी । अ॑नामयि॒त्नुभ्यां॒ हस्ता॑भ्यां॒ ताभ्यां॑ त्वा॒भि मृ॑शामसि ॥ (७)

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अथर्ववेद मन्त्र 4.13.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे उपनयन संस्कार वाले बालक! प्रजापति के दस उंगलियों वाले हाथों के द्वारा निर्मित जीभ शब्दों के आगेआगे चलती है. सरस्वती का उस में अधिष्ठान है. प्रजापति के उन्हीं रोगनाशक हाथों से मैं तेरा स्पर्श करता हूं. (७)

EN English Translation

O children with upanayana rites! The tongue formed by Prajapati's ten-fingered hands moves ahead of the words. Saraswati has a adhishthan in it. I touch you with the same curative hands of Prajapati. (7)

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