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अथर्ववेद

Kanda 4 • Sukta 14 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 4 • सूक्त 14 • मन्त्र 2

4.14.2

Mantra ID: 4.14.2

क्रम॑ध्वम॒ग्निना॒ नाक॒मुख्या॒न्हस्ते॑षु॒ बिभ्र॑तः । दि॒वस्पृ॒ष्ठं स्व॑र्ग॒त्वा मि॒श्रा दे॒वेभि॑राध्वम् ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 4.14.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मनुष्यो! तुम यज्ञ के निमित्त प्रज्वलित अग्नि के द्वारा दुःख रहित स्वर्ग में पहुंचो. अंतरिक्ष की पीठ के समान स्वर्ग में पहुंच कर तुम देवों के समान ऐश्वर्य प्राप्त करो तथा वहीं निवास करो. (२)

EN English Translation

O men! You reach heaven without sorrow through the agni ignited for the sake of yajna. By reaching heaven like the back of space, you attain opulence like gods and live there. (2)

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