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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 12 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 12 • मन्त्र 2

5.12.2

Mantra ID: 5.12.2

तनू॑नपात्प॒थ ऋ॒तस्य॒ याना॒न्मध्वा॑ सम॒ञ्जन्त्स्व॑दया सुजिह्व । मन्मा॑नि धी॒भिरु॒त य॒ज्ञमृ॒न्धन्दे॑व॒त्रा च॑ कृणुह्यध्व॒रं नः॑ ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.12.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे शरीररक्षक एवं उत्तम जिह्वा वाले अग्नि! तुम सत्यलोक को प्राप्त कराने वाले मार्गो को मधुर बना कर उन का आस्वादन करो एवं मेरे यज्ञ को बढ़ाते हुए इसे देवों को प्राप्त कराओ. (२)

EN English Translation

O agni with a body protector and a good tongue! You make the paths that attain Satyalok sweet and taste them and increase my yajna and get it to the gods. (2)

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