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5.18.7
श॒तापा॑ष्ठां॒ नि गि॑रति॒ तां न श॑क्नोति निः॒खिद॑न् । अन्नं॒ यो ब्र॒ह्मणां॑ म॒ल्वः स्वा॒द्वद्मीति॒ मन्य॑ते ॥ (७)
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अथर्ववेद मन्त्र 5.18.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
जो पापी ब्राह्मण के अन्न को स्वादिष्ट समझ कर भक्षण करता है, वह पापी मानव सैकड़ों विपत्तियों को निगलता है. (७)
EN English Translation
The sinful person who eats the food of the sinful Brahmin as delicious, that sinful person swallows hundreds of plagues. (7)