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अथर्ववेद

Kanda 5 • Sukta 18 • Mantra 8

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 5 • सूक्त 18 • मन्त्र 8

5.18.8

Mantra ID: 5.18.8

जि॒ह्वा ज्या भव॑ति॒ कुल्म॑लं॒ वाङ्ना॑डी॒का दन्ता॒स्तप॑सा॒भिदि॑ग्धाः । तेभि॑र्ब्र॒ह्मा वि॑ध्यति देवपी॒यून् हृ॑द्ब॒लैर्धनु॑र्भिर्दे॒वजू॑तैः ॥ (८)

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अथर्ववेद मन्त्र 5.18.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ब्राह्मण की जीभ धनुष की प्रत्यंचा, वाणी धनुष की लकड़ी और तपस्या के कारण पवित्र दांत तीर हैं. ब्राह्मण देवताओं से प्रेरित इन्हीं धनुष बाणों से देव हिसंकों को बींधता है. (८)

EN English Translation

The tongue of the Brahmin is the pratyancha of the bow, the wood of the speech bow and the sacred tooth is the arrow due to penance. Inspired by Brahmin gods, these bows and arrows pierce the gods. (8)

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