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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 111 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 111 • मन्त्र 2

6.111.2

Mantra ID: 6.111.2

अ॒ग्निष्टे॒ नि श॑मयतु॒ यदि॑ ते॒ मन॒ उद्यु॑तम् । कृ॑णोमि वि॒द्वान्भे॑ष॒जं यथानु॑न्मदि॒तोऽस॑सि ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 6.111.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे गंधर्व ग्रह से गृहीत पुरुष! यदि तेरा मन गंधर्व ग्रह के विकार से उद्भ्रांत है तो अग्नि तेरे मन को शांत करें. प्रतिकार को जानता हुआ मैं इस ग्रह विकार की ओषधि करता हूं, जिस से तू उन्माद रहित बन. (२)

EN English Translation

O man assumed from the planet Gandharva! If your mind is disturbed by the disorder of the planet Gandharva, then agni should calm your mind. Knowing the resistance, I meditate on this planetary disorder, so that you become free from frenzy. (2)

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